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प्रेम विवाह कैसे होगा सफल

How to successful love marriage

How to successful love marriage

प्रेम विवाह आज के भौतिक युग में आम बात हो गई हैं युवावस्था में प्रवेश करते ही प्रत्येक युवक-युवती स्वप्निल संसार में खोया रहता है लेकिन कहते है कि जोडि़याँ विधाता द्वारा प्रहले से ही तय की हुई होती है। पूर्वजन्म के शुभ कर्मो के अनुसार ही वर्तमान जीवन में जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। जीवनसाथी के बारे में जन्मकुण्डली के द्वारा पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है। जीवनसाथी के बारे में जन्मकुण्डली के द्वारा प्रर्याप्त जानकारी प्राप्त की जा सकती है कि जीवनसाथी का स्वभाव, चरित्र, रहन-सहन, मनोदशा एवं व्यवाहर कैसा होगा? जातक का विवाह, दो विवाह या बहु विवाह होगा?  विवाह मे सुख पर्याप्त मिलेगा अथवा नहीं? विवाह घरवालों द्वारा तय किया जायेगा या प्रेम विवाह होगा? कई बार ऐसा होता है कि युवक-युवती द्वारा लाख कोशिशों के उपरान्त भी माता-पिता प्रेम विवाह की अनुमति नहीं देते। आखिर क्यों? क्या इस स्थिति में माता-पिता को राजी किया जा सकता है? इस लेख के द्वारा हम प्रम विवाह के ज्योतिषीय योग एवं उदाहरण द्वारा प्रेम विवाह के ज्योतिषीय योग एवं उदाहरण द्वारा प्रेम विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने सम्बन्धित सरल, लेकिन विशिष्टि उपयों के बारे में अध्ययन करेगें।

जन्मकुण्डली में प्रथम भाव जातक की आत्मका, तृतीय भाव इच्छा का, चतुर्थ भाव हृदय का एवं पंचम भाव प्रेम का, सप्तम भाव जीवनसाथी का, तो पंचम भाव से पंचम अर्थात नवम भाव भाग्य एवं प्रेम का कारक भाव हैं पंचम एवं नवम भाव का कारक गुरू है, तो सप्तम भाव का कारक ग्रह पुरूषों के लिए शुक्र एवं स्त्रियों के लिए गुरू है। शनि एवं राहु को विजातीय स्वभाव एवं पृथकताकारी ग्रह माना जाता है। चन्द्रमा जहाँ मन का करक है वहीं शुक्र प्रेम का एवं मंगल काम का कारक है। शनि एवं राहु का जितना इन कारकों पर प्रबल प्रभाव होगा, उतनी ही प्रेम विवाह की प्रबल सम्भावना होगी। सूर्य एवं गुरू को सात्विक ग्रह माना जाता है, लेकिन कभी-कभी ये ग्रह भी प्रेम विवाह में अपनी-अपनी छाप छोड़ देते है। कुछ परिस्थितियों में राहू और शनि भी प्रेम विवाह में अड़चन डाल देते है, लेकिन ऐसी स्थिति बहुत कम दृष्टिगोचर होती है।

प्रेम विवाह के ज्योतिषीय कारण

  1. सप्तमेश सप्तम भाव में स्थित हो एवं लग्न में राहु स्थित हो, तो ऐसे जातक का प्रेम विवाह होता है। राहु लग्न में स्थित होकर प्रेम भाव एवं जीवनसाथी के भाव दोनों को प्रभावित करेगा। राहु विजातीय प्रेम विवाह के योग बनाएगा।
  2. सप्तमेश एवं सप्तम भाव कारक ग्रह शुक्र अथवा गुरू पर शनि अथवा राहु की युति अथवा दृष्टि भाव हो, तो ऐसा जातक प्रेम विवाह कर लेता है। बाद में माता-पिता की स्वीकृति भी मिल जाती है।
  3. लग्नेश एवं तृतीयेश का यदि किसी भी प्रकार से पंचमेश, सप्तमेश अथवा नवमेश के सम्बन्ध हो, तो प्रेम विवाह के योग बनते है। इसमें यदि शनि एवं राहु उत्प्रेरक की भमिका निभाएँ तो प्रेम विवाह अवश्य ही होता है।
  4. पंचमेश-सप्तमेश की युति अथवा सप्तमेश-नवमेश की युति सप्तमेश-लाभांश की युति अथवा शुक्र एकादशेश एवं पंचमेश की युति, दृष्टि सम्बन्ध बनाए, तो भी प्रेम विवाह होता है।
  5. एकादशेश अथवा शुक्र से सम्बन्ध बनना एक युवती हेतु जहाँ किसी युवक द्वारा प्रेम विवाह का ऑफर आता है, तो एकादशेश का सप्तमेश अथवा गुरू से सम्बन्ध युवक हेतु किसी युवती द्वारा प्रेम विवाह का प्रस्ताव दिया जाता है, जिसका परिणाम कारक ग्रहों के बलाबल पर निर्भर करता है।
  6. चन्द्रमा सप्तम भाव में सप्तमेश के साथ स्थित हो अथवा लग्न में लगनेश के साथ हो, तो प्रेम विवाह की सम्भावना होती है। यदि तृतीयेश एवं पंचमेश भी किसी प्रकार सहायता दे दें, तो प्रेम विवाह हो जाता है।
  7. सप्तमेश-एकादशेश अथवा सप्तमेश एवं पंचमेश में परिवर्तन योग हो, तो प्रेम विवाह की इच्छा जाग उठती है, लेकिन परिपक्वता तभी आएगी, जब शुक्र अथवा चन्द्रमा से किसी प्रकार का सम्बन्ध होगा अन्यथा प्रेम विवाह एक स्वप्न बनकर रह जाता है।
  8. पंचमेश की शुक्र से युति अथवा सप्तमेश से युति प्रेम विवाह की लालसा उप्तन्न करती है। यदि पंचमेश मंगल अथवा शुक्र हो एवं मंगल तथा शुक्र दोनों की युति पंचम भाव में हो, तो ऐसा प्रेम मात्र शारीरिक सुख प्राप्त करने के लिए होता है। इच्छापूति के बाद प्रेम विवाह में परणिति नहीं हो पाती है।
  9. राहु प्रेम विवाह में कारक ग्रह तभी बनता है, जब कुण्डली में कालसर्प योग की स्थिति निर्मित नहीं होती। शनि, राहु एवं सूर्य का दृष्टि प्रभा व प्रेम विवाह के सुख में कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य छोड़ता है।
  10. नवमेश अथवा द्वितीयेश, चतुर्थेश गुरू अथवा सूर्य होकर कुण्डली में बली हो, तो प्रेमियों को माता-पिता एवं परिजनों से भारी विरोध झेलना पड़ता है। यदि ये कमजोर होकर स्थिति हो, तो प्रेम विवाह में मामूली अवरोध ही उत्पन्न कर पाते है।
  11. सप्तमेश शुक्र मंगल के प्रभाव में हो अथवा पंचमेश, नवमेश, सप्तमेश होकर लग्नेश से सम्बन्ध बनाए अथवा अष्टमेश से किसी प्रकार का सम्बन्ध बनाए, तो प्रेम विवाह मात्र आकर्षक होकर शरीरिक सुख भोगने तक ही सीमित रहता है।

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